बॉर्नवीटा – तन की शक्ति, मन की शक्ति बॉर्नवीटा

Bournvita

बॉर्नवीटा

चॉकलेट के लिए दुनिया की दिग्गज कंपनी कैडबरीज को यदि बच्चों के दाँत खराब करने के लिए कोसा जाता है तो उसे बच्चों को सेहतमंद बनाने का श्रेय भी है। बॉर्नवीटा ड्रिंक के माध्यम से कैडबरीज पिछले 75 सालों से दुनिया भर की माँओं और बच्चों को सेहतमंद विकल्प उपलब्ध करवा रही है।

Bournvita has been a market leader in the Health Drinks market as well as have a dominant share of the Chocolates market. The core values of the brand have been mental alertness and physical fitness for children who consume Bournvita daily. This layered with the great Cadbury chocolate taste has made the brand distinct from other offerings in the consumers mind. The brand was re-launched with a completely new identity in 2001. In its new avtaar, the brand had a new, bold logo, trendy packaging and enhanced Cadbury values through better pack graphics.

‘बॉर्नवीटा’ को हम एक ऐसे ड्रिंक के नाम से जानते हैं, जो खासतौर पर उन लोगों की पसंद है, जो अपने बच्चों के लिए संपूर्ण पोषण चाहते हैं। इसकी ब्रांडिंग की पंच लाइन ‘तन की शक्ति, मन की शक्तिङ्तबॉर्नवीटा’ इसी तर्ज पर बनाई गई थी कि यह एक ऐसा ‘हेल्थ ड्रिंक’ है, जो 2 से 14 साल तक के बच्चों को स्वाद के साथ पोषण भी देता है। बॉर्नवीटा*  कैसे, कहाँ और क्यों बना,  यह जानने से पहले हम कैडबरी कंपनी की जड़ों की ओर, करीब 200 साल पहले के उस दौर में लौटते हैं जब ब्रिटेन दुनिया की एकमात्र महाशक्ति था।

*बोर्नविटा शब्द ‘बोर्नविले’ नाम की जगह और वाइटेलिटी यानी जीवन शक्ति से मिलकर बना है। माना जाता है कि 25 ग्राम बोर्नविटा में 100 कैलोरी शक्ति होती है।

कहानी शुरू होती है जॉन कैडबरी नाम के एक युवा कारोबारी से, जिसका छोटा सा परिवार ब्रिटेन के बर्मिंघम इलाके में रहता था। बेरोजगार जॉन कुछ काम शुरू करना चाहता था। काफी सोच-विचार के बाद उसने चाय, कॉफी और कोकोआ चॉकलेट ड्रिंक (कोका पेड़ के बीजों से बना एक तरह का ड्रिंक) बेचने के लिए एक छोटी सी दुकान शुरू की। सन् 1824 में बर्मिंघम के 93, बुल स्ट्रीट में शुरू हुई यह दो कमरों की दुकान आज दुनिया की सबसे बड़ी चॉकलेट कन्फेक्शनरी कंपनी का रूप ले चुकी है। दुकान शुरू करने के साथ जॉन कैडबरी ने पाया कि ग्राहकों की रुचि चाय-कॉफी में कम और कोकोआ पेय में ज्यादा थी। ज्यादा मुनाफा कमाने की दृष्टि से उसने अपना पूरा ध्यान कोकोआ ड्रिंक पर लगाया। एक तरह से इसी ड्रिंक को बॉर्नवीटा का पहला स्वरूप माना जा सकता है। जॉन दुकान के दूसरे कमरे में खुद ही कोका बीज पीसते और पॉउडर के साथ नए प्रयोग कर ग्राहकों को लुभाते। उन दिनों कोका और चॉकलेट ड्रिंक पीना रईसों का शौक माना जाता था। वजह थी कि कोका के बीज सुदूर अमेरिका और अफ्रीकी देशों से मँगाने पड़ते थे, जो कि काफी खर्चीला काम था। बहरहाल, जॉन ने बर्मिंघम के रईसों के स्वाद की नब्ज पकड़ ली थी। जब कुछ पैसा जमा हो गया तो उन्होंने अपने कोका उत्पादों को चॉकलेट के नाम से प्रचारित करना शुरू किया। उन्होंने खर्चीली मार्केटिंग का सहारा लिया, जिससे जल्दी ही उनकी दुकान पूरे इलाके में मशहूर हो गई।

करीब 15 साल बुल्स स्ट्रीट की दुकान चलाने के बाद जॉन कैडबरी ने बड़े सपने देखने शुरू किए, जिसमें खुद की फैक्टरी लगाना सबसे पहला था। चॉकलेट कारोबार को फैलाने के लिए उन्होंने अपने भाई बेंजामिन को साझीदार बनाया। अब वे कैडबरी ब्रदर्स ऑफ बर्मिंघम के नाम से मशहूर हो गए थे। दोनों ने वर्ष 1840 में ब्रिटेन के ब्रिज स्ट्रीट इलाके में अपनी फैक्टरी स्थापित की। उनका काम चल निकला और वे सफल उद्यमियों में गिने जाने लगे। 1850 में ब्रिटिश सरकार ने कोका बीजों पर आयात शुल्क घटा दिया, जिससे उनका कारोबार और ज्यादा फलने-फूलने लगा। अपनी खास तरह की चॉकलेट और ड्रिंक्स के कारण वे जल्दी ही वे पूरे ब्रिटेन में मशहूर हो गए। कारोबार को अच्छी तरह स्थापित करने के बाद उन्होंने अपने दोनों बेटों, रिचर्ड और जॉर्ज को अपनी जगह लेने लायक बना दिया था। नए उद्योग की चुनौतियाँ नई थीं और उनकी टीम को भी कोई विशेष अनुभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने पिता के पारंपरिक नुस्खे को नई तकनीकों के साथ आजमाया। ‘द बेस्ट क्वालिटी’ की जिद को पूरा करने के लिए कैडबरी ब्रदर्स ने नई तकनीक और नई प्रक्रिया अपनाई। नई और बड़ी फैक्टरी लगाने की नई योजना ने 1879 में बोर्नविले नामक एक छोटे से कस्बे में आकार पाया।

बोर्नविले में फैक्टरी स्थापित करने के बाद कारोबार तेजी से बढ़ा। यहीं कैडबरी की सबसे मशहूर चॉकलेट ‘डेयरी मिल्क’ का आविष्कार हुआ और यहीं से कोको ड्रिंक चॉकलेट को ‘बॉर्नवीटा’ नाम भी मिला। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि कोको ड्रिंक कैडबरी चॉकलेट से पहले आया, लेकिन इसे सही पहचान बॉर्नवीटा से ही मिली। बोर्नविले के बाद कैडबरी ब्रदर्स ने चॉकलेट के अलावा ऐसा ड्रिंक पॉउडर लाने की योजना बनाई, जो स्वाद के साथ पोषण भी दे सके। काफी शोध और कई विकल्पों को आजमाने के बाद सन् 1932 में कंपनी ऐसा प्रोडक्ट बनाने में सफल हो गई, जो पोषण की खूबियों से भरपूर था। कंपनी ने इसे एक खास तरह के बीकरनुमा जार में सूखे पॉउडर के रूप में पेश किया, जो ग्राहकों को काफी पसंद आया। कैडबरीज चॉकलेट के प्रशंसकों को तो यह प्रोडक्ट ज्यादा रास नहीं आया, लेकिन बॉर्नवीटा उन माँओं को खासतौर पर पसंद आया, जो दूध पीने में नखरा करनेवाले लाडलों के लिए ढेरों जतन करती थीं। ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों में इस फॉर्मूले को हाथोहाथ ले लिया।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस नए ब्रांड के विस्तार के लिए व्यापक रणनीति तैयार की गई। इसके तहत कंपनी ने एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप के उन देशों का रुख किया, जहाँ कुपोषण की दर सबसे अधिक थी। 1948 में भारत में बॉर्नवीटा की लॉञ्चिंग भी इसी रणनीति का नतीजा था । भारत में लॉञ्चिंग के समय कंपनी का नाम कैडबरीज फ्राय इंडिया लिमिटेड था, जो बाद में कैडबरीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड हो गया। जब कैडबरीज ने भारत में कारोबार शुरू किया था तब देश बहुत खस्ताहाल था। 200 साल के स्वतंत्रता संग्राम और गरीबी के कारण कैडबरीज जैसी कंपनी के उत्पाद एक खास वर्ग की ही पहुँच में थे। करीब 30 साल तक कंपनी ने संघर्ष किया। हालात 80 के दशक से बदलना शुरू हुए।

1972 में कैडबरीज ने रेडियो क्रांति का सदुपयोग करते हुए पहली बार ऑल इंडिया रेडियो पर बॉर्नवीटा क्विज शुरू की, जो इसकी मार्केटिंग का सबसे मजबूत हथियार साबित हुई। जैसे ही ’90 का दशक शुरू हुआ, कैडबरीज ने बॉर्नवीटा की मार्केटिंग को स्वाद और सेहत से जोड़ते हुए दो नए नारे दिए- ‘ब्रॉट अप राइट, बॉर्नवीटा ब्राइट’ और ‘गुडनेस देट ग्रोज़ विद यू’ । बॉर्नवीटा की भारत में सफलता का सफर इन्हीं दो नारों के साथ आगे बढ़ा है। परिणाम! देश के मध्यम आय वर्ग की जनसंख्या में बढ़ोतरी के साथ ही दर्जनों बहुराष्ट्रीय ब्रांड तेजी से आगे बढ़े हैं, जिनमें बॉर्नवीटा प्रमुख है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक को एक बड़ी चुनौती के रूप में लेते हुए बॉर्नवीटा को री-लॉञ्च  किया गया। इसके मार्केटिंग मिक्स को पूरी तरह से नए ढंग से पेश किया गया। टी.वी. को ब्रांड प्रमोशन का नया हथियार बनाया गया।  बॉर्नवीटा क्विज कांटेस्ट को डेरिक ओ’ब्रायन जैसे मशहूर होस्ट के माध्यम से पेश किया गया। बॉर्नवीटा की टीम एक साल में ढाई लाख बच्चों तक पहुँच गई और पूरे अभियान के तहत करीब 20 लाख बच्चों को ‘तन की शक्ति, मन की शक्तिङ्तबॉर्नवीटा’ के मशहूर अभियान के साथ सामान्य ज्ञान के खजाने से रूबरू कराया गया।

नई सदी के शुरू होते ही बॉर्नवीटा के प्रोडक्ट मिक्स और मार्केटिंग मिक्स में एक बड़े बदलाव की रूपरेखा बनाई गई। अपने जन्म से लेकर सन् 2000 तक बॉर्नवीटा का प्रचार ऐसे किया गया था कि पहले माँ उसे पसंद करे और फिर अपने बच्चों के लिए अपनाए। नए मार्केर्टिंग प्रमोशन में इस कैंपेनिंग उलट दिया गया। पहले बच्चे उसे पसंद करें और फिर माँ उसे अपनाएँ। दूध की उपलब्धता के आधार पर हमारे देश को दो प्रमुख हिस्सों में बाँटा जा सकता है। भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में दूध की अधिकता है, जबकि दक्षिण और पूर्वी में दूध कम मिलता है। कैडबरीज ने अपनी मार्केटिंग रणनीति इसी के आधार पर बनाई है। यह रणनीति बेहद कारगर रही है और नतीजा यह हुआ कि ब्रॉउन मिल्क फूड ड्रिंक के लगभग आधे बाजार पर बॉर्नवीटा का कब्जा हो गया है। 2006 में बॉर्नवीटा ने अपनी आधी सदी से चली आ रही पैकिंग और ब्रांड लोगो को बदल दिया। इस इंटरनेशनल ट्रेंडी पैकेजिंग के साथ पहली बार बॉर्नवीटा को फाइव स्टार मैजिक चॉकलेट के नए स्वाद के रूप में पेश किया गया। बॉर्नवीटा ने पोगो टी.वी. पर बॉर्नवीटा कॉन्फीडेंस अकेडमी भी लॉञ्च  की है। यह क्विज शो की ही तरह का एक अनूठा कार्यक्रम था, जिसमें बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए एक आधार मिला। बॉर्नवीटा ने हाल ही में डी.एच.ए. प्रोटीन के साथ बढ़ते बच्चों के लिए खास प्रोडक्ट लिटिल चैंप लॉञ्च  किया है, जिसे सानिया मिर्जा के एड प्रमोशन के जरिए प्रचारित किया गया। वर्तमान में भारत के मिल्क फूड ड्रिंक बाजार पर बॉर्नवीटा की पकड़ है।

पिता जॉन कैडबरी ने अपना कारोबार विशुद्ध पारिवारिक तरीके से आगे बढ़ाया था, लेकिन दूसरी पीढ़ी में उनके बेटे जॉर्ज कैडबरी के नेतृत्व में कंपनी ने शानदार और वैश्विक सफलता अर्जित की है। इसके पीछे जॉर्ज की दूरदृष्टि, लगन और बेहतरीन प्रबंधन क्षमता थी। जब उन्होंने बोर्नविले में नई फैक्टरी लगाई तो अपने 2,500 कर्मचारियों को यह अहसास कराया कि वे भी कैडबरी परिवार का ही हिस्सा हैं। उनके लिए रहने-खाने, चिकित्सा, शिक्षा और प्रशिक्षण की बढि़या सुविधाएँ फैक्टरी की 14 एकड़ जमीन पर ही जुटाई गईं। यहाँ तक कि कर्मचारियों को पेंशन भी दी गई, जिससे वे जीवनपर्यंत कंपनी के प्रति वफादार बने रहे। अनुकूल नतीजे निकले और कैडबरी ने अपने उत्पादों में अपेक्षा से अच्छी गुणवत्ता व स्वाद देने की नई परंपरा कायम की, जो आज तक जारी है।

भारत में कैडबरी

सन् 1998 कैडबरी ने भारत में अपनी गोल्डन जुबली मनाने के बाद अब 60 बरस की हो चुकी है। 1980 के मॉस्को ओलंपिक में बॉर्नवीटा भारतीय टीम का ऑफिशियल ड्रिंक था। रितिक रोशन की मशहूर फिल्म ‘कोई मिल गया’ और ‘क्रिश’ में बॉर्नवीटा को सुपर हीरो का पसंदीदा ड्रिंक बताया गया था। चेयरमैन वायसी पाल व एम.डी. आनंद कृपालु के नेतृत्व में आज कैडबरीज कंपनी के पास करीब दो हजार कर्मचारियों की समर्पित टीम, 5 फैक्टरियाँ, 4 सेल्स ब्रांच हैं, जिनकी पहुँच 14 लाख से ज्यादा ऑउटलेट्स तक हैं। कंपनी को भारत की बेस्ट मैनेज्ड तथा इंडियाज टॉप 25 ग्रेट प्लेस टू वर्क का सम्मान भी मिला है।

Got a match

In 1855, a Swedish industrialist and inventor Joan Edvard Lundstorm lit up the world with his humble invention. Lundstorm solved the problem of ’ phossy jaw’ and created the world’s first safety match stick. A simple stick of fire or a bold beacon of light ?

You decide. THINK SAFETY !

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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