बाबा रामदेव: द ग्रेट मार्केटियर

ब्रांड लोकल हो या ग्लोबल, सामान्यतः उसकी सफलता उत्पाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है; पर यदि उत्पाद के साथ प्रतिष्ठित ब्रांडनेम जुड़ा हो तो ग्राहक गुणवत्ता परखने के पहले ही उत्पाद लपक लेते हैं। बाबा रामदेव भारत की पुरातन योग विधा की नई पहचान बनने के साथ दिव्य फार्मेसी, हरिद्वार की आयुर्वेद व हर्बल औषधियों की गुणवत्ता के ऐसे ही पुख्ता प्रमाण, यानी एक प्रतिष्ठित ब्रांडनेम बन गए हैं। दिव्य फार्मेसी सालाना करीब 300 करोड़ रुपयों की हर्बल औषधियाँ बेच रही है। हालाँकि आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार ये ही नहीं, सारी हर्बल औषधियों से फायदे के सारे दावे संदेहास्पद हैं, क्योंकि इनकी क्लिनिकल ट्रायल नहीं हुई है। मॉडर्न मैनेजमेंट की भाषा में कहें तो बाबा रामदेव ऐसे ग्रेट मार्केटियर हैं, जिन्होंने दिव्य फार्मेसी के उत्पादों को वैसे ही प्रमोट किया है जैसे कभी महात्मा गांधी ने गुलाम भारतीयों में स्वतंत्रता की चाह जगाई थी।

पौराणिक मान्यता के अनुसार 10 लाख साल पहले आयुर्वेद के जनक चरक ने करीब 36 हजार औषधियों की खोज की थी। सवाल उठता है कि एक व्यक्ति कितनी जड़ी-बूटियों की कैसे पहचान और परीक्षण कर सकता है। संभवतः चरक किसी व्यक्ति का नाम नहीं था, बल्कि शोध-अनुसंधानकर्ता, विद्वानों का सर्वनाम था। इस नाम के कई लोग रहे होंगे, जिन्होंने हजारों जड़ी-बूटियों को पहचाना और उनकी उपयोगिता जन-जन तक पहुँचाई। तदनुसार बाबा रामदेव हमारे युग के चरक हैं, जिन्होंने योग के बहाने आयुर्वेदिक औषधियों और जड़ी-बूटियों को जन-जन तक पहुँचाया है।

याद करें, देश को आजादी दिलवाने के संकल्प के साथ मोहनदास करमचंद गांधी जब स्वदेश लौटे थे, तब भारतीयों के मन में आजादी की चाह जगाना एक बड़ी चुनौती थी। सदियों की गुलामी ने 35 करोड़ भारतीयों (तब) को इतना निस्तेज कर दिया था कि वे फिरंगियों के विरुद्ध सोचने से भी डरते थे।

ब्रांडेड शर्ट-ट्राउजर्स पहनकर मार्केट सर्वे करनेवाले युवा मार्केटियर्स ध्यान दें कि गांधीजी ने सबसे पहले सूट-बूट उतारे तथा धोती पहनी, लाठी थामी, ताकि वे उनके जैसे दिखें जिनसे उन्हें जुड़ना है। लक्जरी यात्रा का मोह त्यागा और रेल की तृतीय श्रेणी में सारे देश का भ्रमण किया, ताकि उन लोगों को नजदीक से देख सकें, जिन्हें उन्हें आजादी के आंदोलन से जोड़ना है। जमीन से जुड़े इस दिलचस्प सर्वे के दौरान ही गांधीजी ने देखा कि लोग ‘महात्मा संत’ से सम्मोहित हैं तो वे भी बन गएङ्तमहात्मा गांधी। परिणाम! महात्मा गांधी देखते-देखते आजादी की चाह के उत्प्रेरक बन गए। एक कालजयी मार्केटियर की हैसियत से उनकी सबसे बड़ी सफलता हैङ्तआजादी का ऐसा संकल्प लोगों के मन में दृढ़ता के साथ स्थापित कर देना, (बेच देना) जिसे पाने के लिए लाखों लोगों को मिली जेल की अँधेरी कोठरी, लाठी और गोली।

ध्यान दें कि बाबा रामदेव ने भी प्रकारांतर में यही करिश्मा दोहराया है। उन्होंने संन्यासी वेशभूषा नहीं त्यागी और योग गुरु की अपनी पहचान बनाई। इसके बाद ही योग के साथ या कहें कि योग के बहाने दिव्य फार्मेसी को दस वर्षों में सौ साल पुरानी डाबर या वैद्यनाथ जैसी कंपनियों के लिए चुनौती बना दिया। यही नहीं, अपनी ब्रांड लायल्टी इतनी पुख्ता कर ली है कि वे अब राजनीति को पाक-साफ करने का दावा करते हैं तो लोग मखौल नहीं उड़ाते, भरोसा कर लेते हैं। आइए, जानें कैसे बने बाबा रामदेव एक प्रतिष्ठित ब्रांड।

हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक निर्धन किसान परिवार में जनमे रामकिशन यादव ने आठवीं कक्षा तक ग्रामीण स्कूल में पढ़ाई करने के बाद खानपुर के एक गुरुकुल में योग व संस्कृत सीखी। बाल्यकाल में उन्हें लकवा हो गया, पर योग ने उन्हें विकलांगता से बचा लिया। गुरुकुल छोड़ते समय रामकिशन यादव संन्यासी बन गए तो उन्हें नया नाम मिला ‘बाबा रामदेव’। वे कई वर्षों तक हिमालय में भटके। सन् 1995 में हरिद्वार में आचार्य कर्मवीर व आचार्य बालकृष्ण के साथ उन्होंने दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट स्थापित किया, जहाँ वे योग प्रशिक्षण देने लगे। जी जागरण के टी.वी. प्रोग्राम ‘ओम योग साधना’ ने उन्हें जन-जन तक पहुँचाया। योग गुरु के रूप में भी बाबा रामदेव ने सबसे अलग पहल की। उनके पहले योग शिक्षक योग-आसन पर जोर देते थे, पर उन्होंने प्राणायाम और युक्त आहार (उचित खान-पान) को महत्त्व दिया। यही नहीं, इस ग्रेट मार्केटियर ने उन सामान्य रोगों पर फोकस किया, जिनसे सबसे ज्यादा लोग पीडि़त हैं। जैसेङ्तरक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, कब्ज, गैस, स्पोंडलाइटिस आदि। खुले मैदान में 20-20 हजार लोगों को तो टी.वी. चैनल्स पर लाखों लोगों को बाबा रामदेव ने योग सिखाया। एक आकलन के अनुसार बाबा रामदेव से 8 करोड़ से ज्यादा लोगों ने योग सीखा है। अध्यात्म गुरु श्री श्री रविशंकर सही कहते हैं कि पुरातन योग विधा को अपनी जनमभूमि पर पुनर्जीवित करने के साथ सारी दुनिया में पहुँचानेवाले शख्स हैं बाबा रामदेव।

ध्यान दें कि बाबा रामदेव ने कभी अपनी योग कक्षाओं में दिव्य फार्मेसी की औषधियों को सीधे प्रमोट नहीं किया, बल्कि लोगों को जड़ी-बूटियों के केवल गुण-धर्म बताए। दिव्य फार्मेसी की औषधियों के नामकरण में भी उनकी ऐसी ही मार्केटिंग सूझ-बूझ समाई हुई है। एक बानगी देखिएङ्तकिडनी रोगों के लिए दिव्य किडनी स्टोन, तनाव-मुक्ति के लिए दिव्य अश्वगंधा, कब्ज से राहत के लिए दिव्य चूर्ण, हृदय रोग के उपचार के लिए दिव्य हृदयमृतावटी, स्किन व पिंपल्स के लिए दिव्य कायाकल्प, मधुमेह के लिए दिव्य मधुनाशिनी, रक्तचाप के लिए दिव्य मुक्तावटी…। यह सूची बहुत लंबी है। इन सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि बाबा रामदेव की सारी औषधियों को उनके आलोचकों ने प्रमोट किया है। बाबा ने सॉफ्ट ड्रिंक्स को मानव स्वास्थ्य के प्रतिकूल बताया और उन्हें टॉयलेट क्लीनर कहा तो इनकी निर्माता कंपनियों ने उन्हें आड़े हाथों लिया, जिससे बाबा रामदेव को खूब प्रचार-प्रसार मिला। सन् 2006 में कम्युनिस्ट पार्टी की वृंदा करात ने आरोप लगाया कि दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट फार्मेसी की कथित हर्बल औषधियों में मनुष्य व पशुओं की हड्डियों का चूर्ण मिलाया जाता है। भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त श्रीराम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिसर्च, दिल्ली ने परीक्षण के बाद इन औषधियों को क्लीन चिट दी तो उनकी बिक्री रातोरात कई गुना बढ़ गई।

चाहे जो हो, महात्मा गांधी हों या बाबा रामदेव, इनका (मार्केटिंग) मंत्र हैङ्तसोच बेचो, पर इसके पहले स्वयं वैसे बनो (या दिखो), जो आपका ‘लक्ष्य’ है। देश को आजादी दिलाने के लिए महात्मा गांधी ने यही किया और निस्तेज भारतीयों को अपना अस्तित्व दाँव पर लगाने को तैयार कर दिया। उनके इसी मंत्र पर चलते हुए बाबा रामदेव ने पहले योग की रोग-निवारक क्षमता जन-जन तक पहुँचाई, अपना संन्यासी रहन-सहन नहीं बदला और इसके बाद ही लोगों को औषधियाँ सौंपीं (बेची)। परिणाम! वे स्वयं एक प्रतिष्ठित व विश्वसनीय ब्रांड बन गए। ऐसे लाइव ब्रांड, जिसके लॉयलिस्ट उन्हें स्कॉटलैंट में 700 करोड़ रुपए का आइसलैंड, होस्टन में 95 एकड़ भूखंड सौंप देते हैं। हरिद्वार में बाबा रामदेव 500 करोड़ रुपए लागत का फूड पार्क स्थापित करते हैं, तो उनके अनुयायी उनके इस वेंचर में चुटकी बजाते ही 300 करोड़ रुपए निवेश कर देते हैं। और बाबा रामदेव! वे खुद को आज भी एक संन्यासी, एक योग गुरु मानते हैं; जबकि सारा देश जानता है कि वे ऐसे नवोदित उद्यमी हैं, जो मात्र एक दशक में शून्य से शिखर पर पहुँचे हैं। दिव्य फार्मेसी सालाना करोड़ों रुपए का कारोबार कर रही है तो बाबा रामदेव की ब्रांड वैल्यू भी करोड़ रुपए है; पर 13 हजार से अधिक लोगों को रोजगार देनेवाले बाबा रामदेव कहते हैंङ्तमैं तो ऐसा संन्यासी हूँ, जो 13 साल से केवल फलाहार पर जिंदा है। अब तो आप भी मानेंगे कि बाबा रामदेव ऐसे ग्रेट मार्केटियर हैं, जिन्होंने दुनिया के दिग्गज मैनेजमेंट गुरुओं को भी कई नए सबक सिखाए हैं।

एक नए आश्रम की स्थापना के लिए वहाँ के महंत ने पुराने आश्रम से एक ब्रह्ममचारी बुलवाया। पुराने आश्रम ने दस ब्रह्मचारियों को रवाना कर दिया। सबको आश्चर्य हुआ कि बुलवाया एक था, दस क्यों भेजे? छह महीने बाद नए आश्रम से जानकारी आई कि जो एक ब्रह्मचारी बुलवाया गया था, वह पहुँच गया है। सबको आश्चर्य हुआङ्तदस भेजे थे, एक ही पहुँचा। खोज की गई तो पता चला कि दस की रवानगी के अगले दिन एक अन्य राज्य के मंत्री ने उनसे कहा, हमारे राजा का निधन हो गया है, राजज्योतिषी ने बताया है कि सीमा पर जो पहला व्यक्ति नजर आए, उसे राजा बनाना। उन दस में से एक ने सोचा, क्या बुराई है, वह रुक गया। अगले दिन दूसरे राज्य के मंत्री ने कहाङ्तहमारे राजा की एक ही पुत्री है, ज्योतिषियों ने बताया है कि सीमा पर जो पहला व्यक्ति आए, उसका राजकुमारी से विवाह करें। एक ब्रह्मचारी वहीं रुक गया। शेष बचे और आगे बढ़े। पर मार्ग में ऐसे प्रस्ताव आते रहे और अंत में पहुँचा एक ही ब्रह्मचारी। इसके बाद यह कहावत जनमीङ्त‘चलते दस हैं, पहुँचता एक है।’

चलते दस हैं, पहुँचता एक है

 

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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