नीविया – सीप का मोती नीविया

Nivea

दुनिया के बाजार में एक ब्रांड का स्थापित करना उतना ही कठिन काम है जितना कि मोतीवाली सीप खोजना। नीविया ब्रांड की संघर्ष गाथा सच्चाई को बयाँ करती है। यह ब्रांड बना, खत्म हुआ और फिर से जिंदा हुआ। नीविया की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। यह लगभग सन् 1875-80 की बात है। जर्मन दुनिया की बड़ी औद्योगिक शक्ति के रूप में उभर रहा था। सैकड़ों जर्मन वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में दिन-रात खपाकर ऐसी ईजादें कर रहे थे, जिनपर बाकी दुनिया या तो हैरान थी या ईर्ष्या कर रही थी। इन्हीं वैज्ञानिकों में से एक थे फार्मासिस्ट कार्ल पॉल बीयर्सडॉर्फ। बीयर्सडॉर्फ उत्तरी जर्मनी के एल्बे नदी के किनारे बसे शहर हैंबर्ग में रहते थे। चिकित्सा-विज्ञान की खोजों को लेकर उनका जुनून उनकी खूबी बन गया था। एक दड़बेनुमा कमरे की अपनी लैब में बीयर्सडॉर्फ मेडिकल साइंस खासकर घाव पर लगाई जानेवाली पट्टियों या प्लास्टर पर नित नए प्रयोग करते रहते थे।

Nivea is a brand of a German based company Beiersdorf. Nivea is the world’s leading producer of skin and body care products. The brand was developed in 1911 when Beiersdorf created a water-in-oil emulsifier as skin cream. The company’s owner Oskar Troplowitz, gave name Nive which means Snow-White in Latin language.  In 1924, Nivea remodeled its cream in a blue tin with a white logo. The logo of Nivea is one of the simplest logo ever seen. The logo just consists of a blue background and white simple typeface, this logo says all the things it wanted to say to its customers. The logo gives the feel of freshness and beauty and displays the brand uniqueness in the market as well.

यह वह दौर था जब दुनिया में हजारों मौतें सिर्फ घावों के सड़ जाने के कारण और संक्रमण के कारण हो रही थीं। एक दिन बीयर्सडॉर्फ ने अपनी लगन से ऐसा मेडिकेटेड बैंडेज बनाने में सफलता पाई, जो आगे चलकर मॉर्डन प्लास्टर टेक्नोलॉजी की बुनियाद बना। बीयर्सडॉर्फ ने इसका नाम ‘गटाप्लास्ट’ रखा और मार्च 1980 में अपने एक अन्य डॉक्टर मित्र डॉ. पॉल गर्सन उना के साथ मिलकर बीयर्सडॉर्फ एजी नाम की कंपनी स्थापित की। 1882 में बीयर्सडॉर्फ ने प्लास्टर पर अपने अधिकार को पुख्ता करने के लिए उसका पेटेंट करवाया और व्यावसायिक उत्पादन करने की योजना बनाई। एक ही साल के भीतर हैंबर्ग शहर के बाहर अल्टोना नाम की जगह में एक छोटी सी यूनिट स्थापित की और बैंडेज-प्लास्टर बनाने लगे। कुल 11 लोगों की टीम के दम पर बीयर्सडॉर्फ एक ही साल में करीब 50 अलग-अलग तरह के बैंडेज बनाने लगे, जो जल्दी ही पूरे जर्मनी में इस्तेमाल होने लगे। आगे के 5-6 साल में बीयर्सडॉर्फ ने अपनी व्यावसायिक बुद्धि के दम पर तेजी से डायवर्सीफिकेशन किया। 1890 के आते-आते उनकी कंपनी 100 से ज्यादा मेडिकल बैंडेज, साल्व्ज, स्टिक्स और साबुन जैसे प्रॉडक्ट्स बनाने लगी। तभी अचानक एक दिन बीयर्सडॉर्फ के 16 साल के एकमात्र बेटे ने आत्महत्या कर ली। बीयर्सडॉर्फ बुरी तरह से टूट गए और उन्होंने पूरे कारोबार को जर्मनी के ही 27 वर्षीय फार्मासिस्ट ऑस्कर ट्रोपलोविज को मात्र 70 हजार मार्क (जर्मन मुद्रा) में बेच दिया। 1 अक्टूबर, 1890 से ट्रोपलोविज ने कंपनी की कमान सँभाली और उन्हीं से शुरू हुआ नीविया ब्रांड का सफर। करीब 10 साल तक उन्होंने बीयर्सडॉर्फ के करीबी रहे लोगों के साथ मिलकर नई-नई ईजादें कीं। इनमें सबसे ऊपर नाम आता है चिपकानेवाले टेप टेसा और नीविया क्रीम का।

सन् 1900 में ट्रोपलोविज को यूसेरिट नामक ऐसे रसायन के बारे में जानकारी मिली, जो चेहरे की रंगत निखार सकता है। यह रसायन ऑस्ट्रेलिया में पाई जानेवाली एक खास किस्म की भेड़ के ऊन में पाए जानेवाले लेनोलिन नामक एक अन्य रसायन से बनाया जाता है। यह रसायन एक इमल्सीफाइंग एजेंट के तौर पर काम करता है और माना जाता है कि त्वचा को गोरा व चमकीला बनाता है। नीविया क्रीम का आधार है यूसेरिट रसायन, जो भेड़ से मिला। 1911 में पहली बार इस रसायन को पानी के साथ मिलाकर एक ऐसे लेप की शक्ल दी गई, जिसे चेहरे पर लगाया जा सकता था। इस प्रकार बने प्रोडक्ट का ब्रांड नेम लैटिन शब्द ‘निवेअस’ के नाम पर ‘नीविया’ रखा गया, जिसका अर्थ होता हैङ्तबर्फ जैसा उजला। यह एक नया व असरदार प्रयोग था। कंपनी ने इसके पेटेंट अधिकार प्राप्त किए और इसे बेचने के लिए नए बाजार तलाशने शुरू किए।

कंपनी ने यूरोप और अमेरिका में अपने ऑफिस स्थापित कर विस्तार नीति पर अमल किया। 1913 तक कंपनी का आकार अपने 1890 के आकार से 30 गुना और मुनाफा 12 गुना बढ़ गया। कारोबार को सँभालने के लिए ट्रोपलोविज ने अपने साथ अपने साले हैंस मेंकीविक्ज को जोड़ा। इस नई जोड़ी ने मात्र 10 साल में दुनिया के विकसित देशों में बीयर्सडॉर्फ को स्थापित कर दिया। सन् 1918 में काल ने फिर से एक बार अपना असली रूप दिखाया। कंपनी के कर्ता-धर्ता ऑस्कर ट्रोपलोविज और उनके साले हैंस मेंकीविक्ज मात्र 6 महीने के अंतराल में असमय ही स्वर्गवासी हो गए। पीछे कोई नहीं था, जो इस पारिवारिक विरासत को सँभाल सके।

कंपनी को कुछ समय ऑस्कर ट्रोपलोविज की पत्नी फ्रॉउ ने सँभाला, लेकिन मजबूरन 1922 में कंपनी को लिमिटेड कंपनी बनाना पड़ा। विली जैकबसन् कंपनी के नए प्रमुख बने। इसी साल कंपनी ने दुनिया का पहला सेल्फ-एडेसिव प्लास्टर ‘हैंसाप्लास्ट’ के नाम से लॉञ्च किया गया, जो आज तक एक प्रतिष्ठित ब्रांड बना हुआ है। 1924-35 में नीविया क्रीम की सुध ली गई और इसे नए नीले पैकिंग में सफेद रंग के लोगो के साथ री-लॉञ्च किया गया। दिलचस्प तथ्य यह है कि नीविया के लिए नीला रंग इसलिए अपनाया गया था कि वह उस दौर में सामाजिक तौर पर सबसे ज्यादा मान्य रंग माना जाता था। आज करीब 85 साल बीत जाने के बाद भी नीविया का नीले-सफेद रंग के प्रति वही प्रेम बरकरार है। नीला-सफेद रंग नीविया का ब्रांड कलर बन चुका है। 1930 तक आते-आते बीयर्सडॉर्फ मेडिकल प्लास्टर, टेप्स, नीविया क्रीम, टूथपेस्ट, लेबेलो लिप बाम, टेनिंग ऑइल, शेविंग क्रीम, शैंपू और फेशियल टोनर जैसे दर्जनों एफ.एम.सी.जी. प्रोडक्ट भी बनाने लगी थी। कंपनी हैंबर्ग स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हो गई थी तथा दुनिया भर में अपनी 20 उत्पादन इकाइयों के साथ तेजी से आगे बढ़ रही थी।

उत्तराधिकारियों के संकट से उबरी कंपनी एक बड़ा कॉरपोरेट समूह तो बन गई, पर जर्मनी की राजनीति के बिगड़ते हालात के कारण मुश्किलों में फँसती जा रही थी। जर्मनी में नाजीवाद आ रहा था। हिटलर का उदय हो रहा था। पूरे देश में यहूदी लोगों के खिलाफ आंदोलन खड़े हो रहे थे। बीयर्सडॉर्फ पर भी मुसीबत आई, क्योंकि इसके ज्यादातर यहूदी या गैर नाजी समर्थकों को पद व देश दोनों ही छोड़ने पड़े। विली जैकबसन् को भी हॉलैंड में शरण लेनी पड़ी। तमाम मुश्किलों के बावजूद कंपनी ने हार नहीं मानी, लेकिन आगे के दस साल में हिटलर के उदय व बरबादी के साथ ही विश्व युद्ध की विभीषिका में बीयर्सडॉर्फ का पूरा कारोबार लगभग तबाह हो गया।

1945 में जब युद्ध खत्म हुआ तो हैंबर्ग की हेडऑफिस व तमाम फैक्टरियाँ तबाह हो चुकी थीं। मित्र देशों के जर्मनी पर नियंत्रण के बाद दुनिया के अन्य देशों ने बीयर्सडॉर्फ और नीविया ब्रांड पर या तो प्रतिबंध लगा दिए या उस पर अपने नाम का ठप्पा लगा दिया। अब सबकुछ लगभग शून्य से शुरू करना था। यह ऐसी चुनौती थी, जिसमें पाने के लिए सबकुछ था, पर खोने के लिए कुछ नहीं। यही सकारात्मक विचार लेकर आगे बढ़े बीयर्सडॉर्फ के प्रबंधकों ने अगले 10 साल में समूह को फिर से खड़ा कर दिया। मित्र देशों की सेनाओं के प्रतिबंध खत्म होने के बाद कंपनी ने तेजी से विस्तार किया। इस दौरान टेसा सेल्फ एडेसिव टेप, डिओ सोप, एट्रिक्स हैंड क्रीम और नीविया ब्रांड से जुड़े अन्य उत्पाद बाजार में उतारे गए।

1963 में कंपनी ने नीविया मिल्क ब्रांड से लिक्विड नीविया क्रीम लॉञ्च किया जिसकी पंचलाइन ‘ऑल-ओवर बॉडी केयर’ थी। बदलते जमाने की बदलती लाइफ स्टाइल के हिसाब से नीविया ब्रांड को स्थापित करने के व्यापक ‘ओनली मी’ एड-कैंपेनिंग शुरू की गई। 1974 में पूरे समूह का पुनर्गठन चार शाखाओंङ्तकॉस्मेड, मेडिकल, फार्मा और टेसा में करके नई जान फूँकने की कोशिश की गई। 1980 के बाद से कंपनी ने एशिया में खासकर भारत और चीन जैसे देशों में नीविया ब्रांड को स्थापित करने की पहल शुरू की। इसके साथ ही यूरोप व अमेरिका में अपने टेप व मेडिकल प्रोडक्ट को स्थापित किया। 1992 में कंपनी ने नीविया को लेकर ब्यू हार्मनी नाम का एड कैंपेन चलाया जो आज तक जारी है। बीसवीं सदी के अंतिम 20 साल में नीविया बीयर्सडॉर्फ समूह की ब्रांड आइडेंटिटी बन चुकी थी। इसी दौरान समूह ने स्विट्जरलैंड के ला पैरी, जुवेना ब्रांड, अमेरिका के फ्यूचुरो ग्रुप जैसे बड़े अधिग्रहण किए और इनॉर्गनिक ग्रोथ के जरिए विश्वव्यापी विस्तार किया। सन् 2000 तक आते-आते कंपनी का टर्नओवर 3 अरब डॉलर सालाना था, जो आगे के 10 साल में लगभग दुगुना हो गया है। वर्तमान में कंपनी दुनिया के करीब 100 देशों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।

नई सदी में भारत जैसे तेजी से उभर रहे बाजारों में नीविया ने अच्छी पकड़ बना ली है। भारत के 2,000 करोड़ रुपए के स्किन केअर बाजार में हालाँकि अभी हिंदुस्तान यूनीलीवर की धाक है, फिर भी नीविया इंडिया को उम्मीद है कि वह अगले तीन सालों में मुनाफा कमाने लगेगी। फिलहाल कंपनी निवेश चरण में है। कंपनी ने वितरक भागीदार जे.एल. मोरिसन् से दिसंबर 2007 में अपने संयुक्त उद्यम को खत्म कर दिया है और जर्मन की बीयर्सडॉर्फ के पूर्ण स्वामित्ववाली सहायक कंपनी बन गई है। कंपनी 2010 तक अपनी बिक्री 600 करोड़ रुपए पहुँचा देना चाहती है, जबकि 2008 में कंपनी ने करीब 200 करोड़ रुपए की बिक्री की है। नीविया की मार्केटिंग प्रमुख सोमा घोष का कहना है, ‘हम अपने वर्तमान उत्पाद पोर्टफोलियो को बेहतर बनाने में जुटे हुए हैं, जिसमें मुख्य तौर पर महिलाओं के चेहरे की देखभाल, डीओड्रेंट और पुरुषों की त्वचा की देखभाल से जुड़े उत्पाद हैं। हम इस श्रेणी में बेहतर किए गए वैरिएंट्स और नए उत्पाद लॉञ्च करेंगे।’ एसी नीलसेन रिटेल मेजरमेंट सर्विसेस के अनुसार, बतौर ब्रांड नीविया ढाई लाख रिटेल स्टोरों में जगह बनाए हुए है। नीविया के सभी कारोबार को मिला दिया जाए तो इसका हिस्सा सभी ब्रांडों में 5 प्रतिशत से भी कम है, सिवाय नीविया की पुरुषों के लिए गोरे होने की क्रीम के, जिसका हिस्सा है 14.6 प्रतिशत।

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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