निरमा – हाथी के कान में चींटी निरमा

Nirma, निरमा

दमी पहले प्यार या पहले युद्ध में जीत के लिए जाना जाता है। करसनभाई एफ.एम.सी.जी. मार्केट में लीवर को हराने के लिए मशहूर हैं; पर उनकी वास्तविक उपलब्धि है, डिटर्जेंट को निर्धन व मध्यमवर्गीय महिलाओं तक पहुँचाना और उन्हें कपड़े पर साबुन रगड़ने व कूटने के झंझट से मुक्ति दिलवाना। करसनभाई ने साबित किया है कि महारथी प्रतिद्वंद्वी की ताकत से मत घबराओ। उसकी कमजोरी खोजो और हिम्मत करके हमला बोल दो। प्रतिद्वंद्वी बचाव करने लगे तो जीत का जश्न मनाओ और पलटवार करे तो समझ लो कि जीत की शुरुआत हो गई है। दूसरे शब्दों में, मोर्चा खोलो तो मैदान में डटे रहो, पलायन मत करो। हर ऊँट के लिए एक पहाड़ बना है। वह पहाड़ तुम वैसे ही हो सकते हो, जैसे लीवर के लिए करसनभाई।

Nirma’s success is synonymous with its advertising and marketing strategy. When Karsanbhai Patel started selling his detergent powder, he decided to call it Nirma, derived from the name of his daughter Nirupama. The white dancing girl, featured in Nirma’s television advertising, is perhaps the most enduring image of Nirma. Though Ms. Nirupama Patel passed away in a car accident, she continues to live on in the corporate logo and the best selling brands of the company.

प्रयास व प्रयोगों से बना पीला पॉउडर

अहमदाबाद को भारत की डिटर्जेंट कैपिटल बनानेवाले करसनभाई पटेल अत्यंत साधारण परिवार में जनमे हैं। थोड़े से स्थूलकाय करसनभाई गुजरात सरकार के खनन व भू-विज्ञान विभाग के पूर्व कारिंदे हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों के रसिया करसनभाई ’60 के दशक में एक सरकारी लेबोरेटरी में असिस्टेंट थे। एक दिन उन्हें सूझा कि महिलाओं के लिए कपड़े धोना मेहनत का घरेलू काम है। इसका कारण है हर कपड़े पर साबुन घिसना व मैल निकालने के लिए उनकी कुटाई करना। डिटर्जेंट पॉउडर इस समस्या का हल है। पर तब यह साधारण साबुन की तुलना में तीन गुना महँगा था, फलतः निर्धन व मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुँच से बाहर था। करसनभाई के महत्वाकांक्षी उद्यमी मन-मस्तिष्क में समा गई एक बात। ऐसा सस्ता डिटर्जेंट बनाना है, जो किफायती हो और कारगर भी? सरकारी नौकरी से घर लौटने के बाद वे घर के एक कमरे में कम लागत में डिटर्जेंट बनाने में जुट गए। कई महीनों के प्रयास व प्रयोगों से बनकर तैयार हुआ एक पीला पॉउडर। करसनभाई ने अपने बाथरूम में इस पॉउडर से स्वयं घर के गंदे कपड़े धोए और संतुष्ट हो गए तो ट्रायल मार्केटिंग को निकल पड़े।

करसनभाई हर रविवार को साइकिल पर झोला लटकाकर अहमदाबाद की निर्धन बस्तियों में पहुँचते। वहाँ महिलाओं से सीधे बात करते। उनसे विनती करते कि साबुन के ही मूल्यवाले उनके पीले डिटर्जेंट को एक बार प्रयोग करें। परिणाम देखने के बाद ही अपनाएँ या रिजेक्ट करें। करसनभाई की सूझ-बूझ रंग लाई। महिलाओं से रिपीट ऑर्डर मिलने लगे तो करसनभाई ने अपने डिटर्जेंट पॉउडर को ब्रांडेड मार्केट में लॉञ्च करने की रणनीति बनाई।

‘झाग के जादू’ ने उड़ाई नींद

सन् 1969 में करसनभाई ने अपनी दिवंगत पुत्री निरमा के नाम से ब्रांडेड मार्केट में पीला डिटर्जेंट पॉउडर लॉञ्च किया। उन दिनों हिंदुस्तान लीवर ‘सर्फ’ 15 रुपए किलो बेच रहा था। निरमा का मूल्य था उससे एक-चौथाईङ्तमात्र 3.60 रुपए किलो। बहुसंख्यक मध्यमवर्गीय परिवारों के साथ संपन्न लोगों ने निरमा को परखा तो पाया कि महँगा डिटर्जेंट व निरमा पॉउडर समान काम करते हैं, पर दोनों के मूल्य में भारी अंतर है। निरमा के इस ‘झाग के जादू’ ने हिंदुस्तान लीवर की नींद उड़ा दी। लीवर के एक बड़े और कमाऊ कारोबार में करसनभाई ने वैसे ही घुसपैठ की, जैसे चींटी हाथी के कान में घुसती है। लीवर को जब होश आया, तब तक निरमा घर-घर में घुस चुका था। इसके बाद लीवर की प्रशिक्षित मार्केटिंग टीम ग्राहकों को ‘सस्ते-महँगे’ व कथित ‘अच्छे-बुरे’ का अंतर समझाते-समझाते थक गई, पर सर्फ का खोया मार्केट आज तक नहीं लौटा। दूसरी तरफ करसनभाई एक के बाद एक पायदान चढ़ते गए और निरमा 2,500 करोड़ रुपए की कंपनी बन गई। आज निरमा सालाना 8 लाख टन डिटर्जेंट उत्पाद बेच रही है और देश के 8 हजार करोड़ रुपए के वॉश-सोप व डिटर्जेंट मार्केट में इसकी हिस्सेदारी 35 फीसदी है।

40 करोड़ से ज्यादा की पसंद

25 फरवरी, 1980 को करसनभाई ने निरमा को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना दिया। नवंबर 93 में वे इसका आईपीओ लाए। सन् 1990 में निरमा ने बॉथ सोप मार्केट में प्रवेश किया। यहाँ भी 65 फीसदी मार्केट हिस्सेदारी के साथ हिंदुस्तान लीवर सबसे अव्वल था। करसनभाई ने लीवर के लोकप्रिय ब्रांड्स पर सीधे हमला किया। लक्स की निरमा ब्यूटी से, लिरिल की निरमा लाइम से, ब्रीज की निरमा रोज से जंग हुई। करसनभाई आज 1 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा बॉथ सोप बनाकर निरमा को इस भारी मुनाफेवाले मार्केट की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बना चुके हैं। निरमा का दावा है कि 40 करोड़ से ज्यादा भारतीय निरमा के विभिन्न प्रोडक्ट हर रोज उपयोग कर रहे हैं और वे ही निरमा ब्रांड के वास्तविक ब्रांड- एंबेसडर हैं।

केस स्टडी बन गई सफलता 

दुनिया के प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल हार्वर्ड के छात्रों ने केस स्टडी की तरह निरमा लॉञ्ंिचग को पढ़ा है। दुनिया के मार्केटिंग गुरुओं ने ‘करसन-करिश्मे’ को उदाहरण बनाकर अपने छात्रों को ‘मास-प्रोडक्ट’ व ‘ब्रांड’ लॉञ्च करने के गुर समझाए और उपभोक्ताओं की ‘मूल्य मानसिकता’ की गूढ़ विवेचना की। मसलन, निरमा डिटर्जेंट की लॉञ्चिंग के पहले देशी-विदेशी कंपनियाँ क्षेत्रीय ब्रांड की उपेक्षा करती थीं और मानती थीं कि मौसमी बुखार है जैसे आया है, वैसे ही चला जाएगा। अपने बोर्ड रूम में ‘लोकल ब्रांड’ की वे चर्चा भी नहीं करती थीं। अब कोई ‘करसनभाई’ कहीं सिर उठाता है तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में खतरे की घंटी बजने लगती है। दिलचस्प बात यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बाँधनेवाले करसनभाई सहज मुसकान के साथ कहते हैंङ्त‘बहुत विचित्र हैं भारतीय और उनसे भी ज्यादा विचित्र है भारतीय मार्केट। यहाँ हर दस-बीस किलोमीटर के बाद बोली (भाषा), बोलने का लहजा (बातचीत), रहन-सहन, खान-पान और उसे सर्व करने का अंदाज बदल जाता है। अनेकता में एकता के सबसे बड़े संरक्षक भारतीय उपभोक्ताओं की नब्ज पकड़ना टेढ़ी खीर है। यहाँ कारोबार वही कर सकता है, जो उनके बीच रहा हो, जिसने उनके जैसा जीवन जिया हो।’

सस्ते का मतलब घटिया नहीं

संक्षेप में कहें तो भारतीय अपने पैसे का मूल्य वसूलने में बेहद माहिर हैं। उपहार, इनाम, एक के बदले दो या उधार जैसे मार्केटिंग फंडे उन्हें ज्यादा देर नहीं रिझाते हैं। वे ब्रांड नाम या विज्ञापन देखते हैं, लेकिन अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करते समय यह भूल जाते हैं कि कौन सी चीज किसने बनाई और कहां बनी, कुटीर उद्योग में या स्टेट ऑफ द आर्ट कारखाने में। स्वदेशी सामान के पक्ष में नारे लगाने से वे पीछे नहीं हटते, पर इतने भोले व भावुक भी नहीं हैं कि देश-प्रेम के नाम पर कोई उन्हें ठग ले। दिलचस्प बात यह है कि मार्केटिंग के सारे गूढ़ मंत्र व सूत्र वे भारतीय ग्रामीण भी बेहतर जानते हैं, जिन्हें दुनिया निरक्षर, नादान, नासमझ व निरीह कहती है। यही कारण है कि यहाँ दुनिया के मार्केटिंग गुरु हार गए हैं। उन्हें परास्त किया है किसी कस्बे, गाँव के करसनभाई ने और उनके ब्रांड निरमा ने।

कितने चतुर हैं गुजराती वणिक करसनभाई। मार्केट पर अपनी पकड़ को मजबूत करने का वे कोई मौका नहीं छोड़ते। ग्राहकों को उन्होंने अपने अंदाज में समझाया है कि सस्ते का मतलब घटिया नहीं होता। निरमा के उत्पाद सस्ते इसलिए हैं कि हमारी लागत कम है। हम लक्जरी पर पैसा खर्च नहीं करते। हम अपने मुनाफे के लिए अधिकतम टर्नओवर पर फोकस करते हैं। करसनभाई का एक कथन कितना दिलचस्प हैङ्त‘क्या करूँ, मजबूर हूँ, यदि देश की 100 करोड़ आबादी तक खुद पहुँच सकता तो विज्ञापन पर एक पैसा भी खर्च नहीं करता।’ यह कहते हुए क्या कहते हैं करसनभाई। उनका आशय है कि उत्पाद के मूल्य का एक हिस्सा वे विज्ञापन पर खर्च करते हैं। यदि ऐसा नहीं करना पड़ता तो वे निरमा ब्रांड के उत्पाद और भी सस्ते में बेचते।

Back in 1770, breadcrumbs were the proffered means to erase pencil marks. Until an English engineer Edward Naime developed eraser. Once while working, he accidentally picked a piece of rubber instead of the lump of bread and put it to good use. Naime rubbed his way into history by helping us erase mistake easily.

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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