जॉनसन ऐंड जॉनसन – मानवता का मान जॉनसन ऐंड जॉनसन

जॉनसन ऐंड जॉनसन

सन् 1886 का उत्तरार्ध था। इधर, भारत में कांग्रेस के उदय के साथ स्वतंत्रता आंदोलन ऊर्जावान् होकर नई राह पकड़ रहा था तो उधर अंग्रेज अपनी महारानी विक्टोरिया को बर्मा (अबम्याँमार) बतौर जन्मदिन के तोहफे में दे रहे थे। इस उथल-पुथल से दूर अमेरिका में एक शख्स संपूर्ण मानवता को तोहफा देने की तैयारियों में जुटा था। इस शख्स का नाम था रॉबर्ट वुड जॉनसन, जो पेशे से एक स्वास्थ्यकर्मी थे। वह उस दौर के साक्षी थे, जब लोग घावों के सड़ने से मर जाते थे। हवा के जरिए संक्रमण फैलानेवाले सूक्ष्म रोगाणुओं से निपटने का कोई कारगर उपाय नहीं था। घावों की ड्रेसिंग के जितने भी विकल्प थे, वे रूई से बनी पारंपरिक पट्टियाँ थीं, जो संक्रमण से बचा नहीं पाती थीं। अमीर देशों में तो लोग फिर भी बच जाते थे, पर गरीब देशों के हालात बहुत बुरे थे। भारत में लड़ाइयों और हादसों में घायल लोग घावों से तड़प-तड़पकर मर रहे थे। ऐसी घटनाओं ने इस अमेरिकी युवक रॉबर्ट वुड जॉनसन को बेचैन किया। उन दिनों चिकित्साकर्मी जोसेफ लिस्टर्स नामक वैज्ञानिक की कार्बोलिक एसिड छिड़काव पद्धति से लोगों को रोगाणुओं से बचाने की कोशिश करते थे। पर, वह तरीका कारगर नहीं था। रॉबर्ट वुड ने कठिन प्रयोगों के बाद ऐसी ड्रेसिंग बनाने में कामयाबी पा ली, जो इन सबकी तुलना में ज्यादा कारगर थी। इसमें रोगाणुओं से लड़ने के लिए उपयुक्त दवा थी और गोंद की ऐसी परत जिससे उसे घावों पर चिपकाया जा सकता था।

Johnson & Johnson was founded more than 120 years ago on a revolutionary idea: Doctors and nurses should use sterile sutures, dressings and bandages to treat peoples’ wounds. Since then, J&J brought the world new ideas and products that have transformed human health and well-being. Robert Wood Johnson, former chairman from 1932 to 1963 and a member of the Company’s founding family, crafted Credo himself in 1943, just before Johnson & Johnson became a publicly traded company. On September 5, 2007 Johnson & Johnson India celebrated 50 years of operations in India. The theme for the celebrations was “A Tradition of Caring”.

मिले तीन भाई, चल निकला कारोबार

रॉबर्ट ने अपने दोनों भाई जेम्स वुड और एडवर्ड मीड को साथ लेकर अपने फॉर्मूले को व्यवसाय में बदलने का निश्चय किया। तीनों भाइयों ने न्यूजर्सी के न्यूब्रंसविक इलाके में वॉलपेपर बनानेवाली एक फैक्टरी खरीदी और 14 कर्मचारियों को नौकरी पर रखकर ड्रेसिंग का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। मेहनत और मानव सेवा संकल्प के साथ शुरू किया गया जॉनसन भाइयों का काम चल निकला। एक ही साल में उन्होंने व्यवसाय को कंपनी का रूप दे दिया। कंपनी का नाम रखा गयाङ्तजॉनसन एंड जॉनसन । डे्रसिंग की माँग बढ़ते ही जॉनसन भाइयों ने उत्पादन बढ़ा दिया। करीब 5 साल में कंपनी ने ड्राय हीट स्टरलाइज बैंडेज बनाने शुरू कर दिए। जल्दी ही उन्हें पूरे अमेरिका से ऑर्डर मिलने लगे। कंपनी ने बैंडेज और डे्रसिंग के प्रॉडक्ट पोर्टफोलियो को बड़ा किया। जॉनसन भाइयों ने रणनीति को ऐसे उत्पादों पर केंद्रित किया, जिनमें भविष्य की संभावनाएँ ज्यादा थीं। अमेरिकी लोग अपने बच्चों की परवरिश को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित रहते हैं, इसलिए जॉनसन भाइयों ने इसी क्षेत्र में नए उत्पाद लॉञ्च किए। सबसे पहले सबसे ज्यादा खपतवाले टेल्कम पॉउडर पर ध्यान दिया। करीब दो साल की रिसर्च के बाद 1893 में कंपनी ऐसा पॉउडर बनाने में सफल हो गई, जो बच्चों की कोमल त्वचा के लिए सुरक्षित था। हलकी खुशबूवाले इस महीन पॉउडर को कंपनी का ही नाम जॉनसन एंड जॉनसन पॉउडर दिया गया।

लांचिंग के कुछ ही महीनों में यह पाउडर पूरे अमेरिका में मशहूर हो गया। कंपनी ने अन्य प्रतिस्पर्धियों के उत्पादों को छोड़ते हुए अपने पॉउडर के बेहद सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण होने का जमकर प्रचार किया। यह उस दौर में बहुत ही ‘कैची फंडा’ था, जो उपभोक्ताओं को भा गया। पॉउडर की पैकेजिंग भी साधारण रखी गई, ताकि लागत न बढ़े। जॉनसन ऐंड जॉनसन पॉउडर एक प्रतिष्ठित ब्रांड बन गया, जिसकी धाक आज तक कायम है।

मानवता का मान, विश्व में पहचान

मानवता की सेवा के संकल्प के साथ बढ़ती कंपनी की प्रतिष्ठा 1906 में उस समय आसमान पर जा पहुँची, जब जॉनसन ऐंड जॉनसन ने सैन फ्रांसिस्को के भीषण भूकंप और आग के दौरान कुछ ही घंटों में दवाइयों व उपचार सामग्री से भरी एक ट्रेन भेज दी। इस निःशुल्क सहायता से सैकड़ों घायलों को समय पर मदद मिली, जिसे आज भी अमेरिकावासी अहसान के साथ याद करते हैं। अपने संस्थापक रॉबर्ट वुड के निर्देशन और दो अन्य भाइयों की मेहनत के दम पर कंपनी जल्दी ही अमेरिका की टॉप मेडिकल कंपनियों में शामिल हो गई। अब इसकी बाकी दुनिया पर नजर थी। लेकिन, सबकुछ इतना आसान कहाँ होता है? 1910 में रॉबर्ट वुड का असमय निधन हो गया और उधर प्रथम विश्वयुद्ध भी शुरू हो गया। अब कंपनी की कमान जेम्स जॉनसन के हाथ थी। 1916 में कंपनी ने चिकोपी मैन्यूफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन को खरीदकर अपनी स्थिति मजबूत की। सन् 1919 में कंपनी ने कनाडा और 1924 में ब्रिटेन में दस्तक देकर विस्तार शुरू किया। नए बाजार की नई माँगों को देखते हुए कंपनी ने नई उत्पाद रणनीति बनाई। इसी के फलस्वरूप 1921 में कंपनी ने बैंड-एड नामक चिपकानेवाले बैंडेज और जॉनसन बेबी क्रीम लॉञ्च किए। बैंडेज इतनी मशहूर हुई कि आज 90 साल बाद भी दुनिया बैंडेज को जॉनसन एंड जॉनसन की बैंड-एड ब्रांड के नाम से ही जानती है। इसके करीब चार साल बाद महिलाओं के विशेष सैनेटरी नैपकिंस लॉञ्च कर कंपनी ने कारोबार विस्तार के नए रास्ते खोले।

मिले जनरल, हुआ कायाकल्प

सन् 1932 में कंपनी को संस्थापक रॉबर्ट का हमनाम बेटा रॉबर्ट जॉनसन सँभालने लगा। वह 25 साल का युवा था और बहुत बड़े सपने देखता था। उसके मन में पिता के समान करुणा और दया भाव था। कंपनी का शीर्ष पद पाने के बाद रॉबर्ट ने अपने फैसलों से जॉनसन एंड जॉनसन को विश्व ख्याति दिलवाई। उन्होंने गरीबों, युद्ध-पीडि़तों और अपने कर्मचारियों की भलाई के कामों को तेजी से आगे बढ़ाया। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कंपनी ने अपने उत्पादों को सेवा कार्यों में लगाया और घायलों की भरपूर मदद की। फलस्वरूप रॉबर्ट जॉनसन को ब्रिगेडियर जनरल की पदवी से नवाजा गया। कर्मचारियों ने उन्हें सम्मान-स्वरूप ‘द जनरल’ का नाम दिया। रॉबर्ट ने 1943 में कंपनी की सामाजिक जिम्मदारियों को चार क्षेत्रों में तय कर उसे संकल्प का रूप दे दिया जो आज तक कायम है। रॉबर्ट जूनियर ने ही कंपनी को दवाइयों, हाइजेनिक उत्पादों और टेक्सटाइल की ओर बढ़ाया।

उन्होंने दर्जनों कंपनियों का अधिग्रहण करके एक ठोस बुनियाद बनाई और ऐसे उत्पादों को आगे बढ़ाया जो सुरक्षित, सस्ते व गुणवत्ता से भरे थे। उन्हीं के कार्यकाल में कंपनी ने खुद को पब्लिक लिमिटेड करते हुए शेयर जारी किए और न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्धता प्राप्त की। पाँचवें दशक में और विस्तार करते हुए कंपनी ने नए अधिग्रहणों की नीति पर चलते हुए भारत, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, बेल्जियम, आयरलैंड, स्विट्जरलैंड, ब्राजील और अर्जेंटीना में भी पैर जमा लिये।

रॉबर्ट जूनियर ने पूरे 31 साल कंपनी को सँभाला, सँवारा और विश्वव्यापी बनाते हुए 1963 में जवाबदारी छोड़ी। इसके बाद पहली बार कंपनी प्रमुख का पद जॉनसन परिवार से बाहर के व्यक्ति को सौंपा गया। नए प्रमुख थे फिलिप हॉफमैन जो बहुत हद तक अपने पूर्व मालिक रॉबर्ट जूनियर की तरह ही थे। उन्होंने भी कंपनी को नई ऊँचाइयाँ दीं। उनके ही कार्यकाल में कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप में विस्तार किया।

भारत में पूरे पचास साल

आगे के दशकों में जेम्स बुर्क, रिचर्ड सेलर्स, डेविड क्लार्क, रॉल्फ एस. लार्सन, रॉबर्ट कैंपबेल, रॉबर्ट एन. विल्सन आदि ने जॉनसन ऐंड जॉनसन को सँभाला और विस्तार दिया। बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक जॉनसन एंड जॉनसन 168 कंपनियों से बना एक ऐसा महाकाय ग्रुप बन चुका था, जो दुनिया के 53 देशों में प्रत्यक्ष और बाकी अन्य में अप्रत्यक्ष रूप से कारोबार करता था। नई सदी में ग्रुप की कंपनियों का आँकड़ा 200 के पार जा पहुँचा है। समूह में एक लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं जो समर्पण भाव से कार्य करते हैं। चिकित्सा जगत् और घरेलू काम में आनेवाले दर्जनों उत्पादों में कंपनी नंबर वन पायदान पर है।

वर्तमान में जॉनसन एंड जॉनसन ऐसी कंपनी के रूप में अपनी साख बचाए हुए है, जिसके उत्पाद बच्चो तक के लिए बेहद सुरक्षित माने जाते हैं। अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ कंपनी ने कभी समझौता नहीं किया। इसी वजह से वर्षों से ब्रांड्स उपभोक्ताओं व चिकित्सा सेवा से जुड़े लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। 5 सितंबर, 2007 को कंपनी ने भारत में पचास साल पूरे करने का जश्न मनाते हुए ‘अ ट्रेडिशन ऑफ केयरिंग’ की परंपरा को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है। भारत में कंपनी की बागडोर ए. वैधीश, एन.के. अंबावनी और राजन तेजुजा जैसे कुशल प्रबंधकों के हाथ में है। समूह का शीर्ष मुख्यालय न्यूब्रंसविक, न्यूजर्सी में ही है, जबकि भारत का मुख्य केंद्र मुंबई में है।

A printers’ strike is what spurred on an American inventor Christopher Sholes to invent the typewriter. In 1867 after several unsuccessful attempts, Sholes along with his partners Soule and Glidden developed basic prototype with a key for each letter that struck upward onto a flat plate. This produce a carbon impression of each letter. With his gift, Sholes proved that every stubborn is latent opportunity, waiting to be exposed.

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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