गूगल – 100 अरब का खोजी नंबर 1 गूगल

Google

सौ अरब डॉलर का ब्रांड पलक झपकते ही इंटरनेट के अथाह सागर से ढेरों जानकारियाँ ढूँढ़ लानेवाला खोजी नंबर ‘गूगल’ अब दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड बन गया है। यह दिग्गज सर्च इंजन 100 अरब डॉलर मूल्य का स्तर पानेवाला पहला ब्रांड भी बन गया है। ‘गूगल’ ने यह उपलब्धि वैश्विक मंदी के ऐसे दौर में हासिल की है जहाँ पाई-पाई बचाने की जद्दोजहद चल रही है। वार्षिक ब्रांड्स टाप-100 की सूची के मुताबिक गूगल ने दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को पछाड़कर यह रुतबा हासिल किया है। माइक्रोसॉफ्ट का ब्रांड मूल्य 76.2 अरब डॉलर आँका गया है। 67.6 अरब डॉलर के ब्रांड मूल्य के साथ कोकाकोला ब्रांड पहली बार सूची में तीसरे पायदान पर काबिज है।

In 1998 Co-Founder & President of Google Sergey Brin created a computerized version of the Google letters using the free graphics program GIMP after learning how to use it. The exclamation mark was added, mimicking the Yahoo! logo. “There were a lot of different color iterations,” says Ruth Kedar, the graphic designer who developed the now-famous logo. “We ended up with the primary colors, but instead of having the pattern go in order, we put a secondary color on the L, which brought back the idea that Google doesn’t follow the rules.”

पेंटागन से प्रेरित होकर जनमे इंटरनेट को दुनिया में आए दो दशक हुए हैं तो,  गूगल ने 7 सितंबर, 2007 को अपना पहला दशक पूरा किया। दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। इंटरनेट का इस्तेमाल जितना बढ़ रहा है, गूगल के शेयर भी उतने ही चढ़ रहे हैं।

19 अगस्त, 2004 को गूगल ने जब पहली बार शेयर बाजार में पैर रखा था, तब उसके शेयर 85 डॉलर में बिक रहे थे। तीन वर्ष बाद, नवंबर 2007 में, उछलकर 747 डॉलर पहुँच गए थे। इस समय इसके शेयर मूल्य 400 डॉलर की रेंज में चल रहे हैं।

विपरीत स्वभाव के दोस्तों की संतान

गूगल चमत्कारिक सफलता की एक ऐसी कहानी है, जो अमेरिका में कैलिफोर्निया की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के दो छात्रों के बीच दोस्ती के साथ शुरू होती है। सेईगेई ब्रिन और लैरी पेज उस समय केवल 22-23 साल के थे, जब वे 1995 में पहली बार मिले थे। उस समय दोनों के बीच बिलकुल नहीं पटती थी। दोनों में बात-बात पर बहस हो जाया करती थी।

सेईगई ब्रिन और सैरी पेज के माता-पिता पढ़े-लिखे थे। पेज के पिता कंप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर थे तो माँ कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा की शिक्षिका। ब्रिन के माता-पिता मॉस्को में गणितज्ञ थे, 1979 में अमेरिका आकर बस गए थे। लैरी और सेईगेई को दोस्त बनाया एक समस्या ने। समस्या थी इंटरनेट जैसे सूचनाओं के महासागर में से किसी खास सूचना को कैसे ढूँढ़ा जाए? दोनों ने मिलकर एक सर्च-मशीन बनाई, एक ऐसा कंप्यूटर, जो कुछ निश्चित सिद्धांतों और नियमों के अनुसार किसी सूचना भंडार में से ठीक वह जानकारी ढूँढ़कर निकाल दे, जो हम चाहते हैं।

आधारभूत सिद्धांत यह था कि हाइपर लिंक द्वारा किसी वेबसाइट की ओर जितना ही अधिक इशारा किया गया हो, उतनी ही महत्त्वपूर्ण वह वेबसाइट होनी चाहिए। हम जिस शब्द, सूचना या प्रश्न के उत्तर की खोज कर रहे हैं, उसकी दृष्टि से इंटरनेट में उपलब्ध उपयोगी वेबसाइटों को छानकर उन्हें एक तर्कसंगत अनुक्रम में पेश करना वह गुत्थी थी, जिसे लैरी और सेईगेई ने मिलकर सुलझाया था।

ब्रिज और पेज ने अपने विश्वविद्यालय में ही आरंभिक परीक्षण किए और 11 लाख डॉलर धन जुटाया। 1 लाख डॉलर का एक चेक उन्हें जर्मनी के एक कंप्यूटर विशेषज्ञ ऐंडी बेश्तोल्सहाईम से भी मिला। दोनों ने 7 सितंबर, 1998 को गूगल इनकॉर्पोरेटेड के नाम से मेनलो पार्क, कैलिफोर्निया के एक कार गैरेज में कंपनी स्थापित की और काम शुरू कर दिया। दो ही वर्षों में गूगल का नाम सबकी जुबान पर था।

एक बेलगाम विश्व-शक्ति

जर्मनी में कंप्यूटर विज्ञान के एक प्रोफेसर डिर्क लेवांदोस्की का मत है कि याहू जैसे अपने अन्य प्रतियोगियों की तुलना में गूगल बेहतर नहीं है, लेकिन उसकी सार्वजनिक छवि ज्यादा अच्छी बन गई है। यही उसकी चमत्कारिक सफलता का रहस्य है।

गूगल ने इस बीच संसार भर में फैली हुई एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का रूप ले लिया है। 17 हजार लोग उसके लिए काम करते हैं। इंटरनेट सर्च मशीन से शुरू कर अब वह ई-मेल, गीत-संगीत, फोटो और वीडियो सामग्री, भू-सर्वेक्षण नक्शों और मोबाइल फोन जैसी अनेक सेवाएँ प्रदान करनेवाली बहुप्रयोजन कंपनी बन गई है। लगभग सभी सेवाएँ मुफ्त हैं। कमाई का स्रोत है व्यावसायिक कंपनियों से मिलनेवाले विज्ञापन।

गूगल ने 2008 में अपनी 10वीं वर्षगाँठ मनाई थी अपना एक अलग इंटरनेट ब्राउजर लाकर। इसका नाम है क्रोम। उसे माइक्रोसॉफ्ट के इंटरनेट एक्सप्लोरर का सबसे तगड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। गूगल का दावा है कि उसका इंटरनेट ब्राउजर क्रोम इंटरऐक्टिव किस्म के प्रयोजनों के लिए बहुत तेज और उपयोगी है, पर सच्चाई यह भी है कि गूगल कंप्यूटर जगत् में अब उस शिखर पर पहुँचना चाहता है, जहाँ माइक्रोसॉफ्ट पहले से है, यानी कंप्यूटर से संबंधित हर चीज उपलब्ध करना। गूगल के सहसंस्थापक सेईगेई ब्रिन के शब्दों में कहें तोङ्त‘गूगल का मिशन है दुनिया भर की सूचनाओं को सुव्यवस्थित करना और सर्वसुलभ करवाना। 1998 में जब हमने शुरू किया था, तब 3 करोड़ वेबसाइटें छान मारी थीं। आज हम कुछेक अरब वेबसाइटें छानते हैं।’

ऑस्ट्रिया के एक खोजी पत्रकार गेराल्ड राइशी ने गूगल की कार्यशैली पर जर्मन भाषा में एक किताब लिखी है। उसमें यही सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि  ‘गूगल एक बेलगाम विश्वशक्ति है’।

अत्यंत शातिर जासूस

राइशी के अनुसार, जब भी हम गूगल की सेवाएँ इस्तेमाल कर रहे होते हैं, गूगल हमारे बारे में ऐसी जानकारियाँ जमा कर रहा होता है, जिनकी हमें भनक तक नहीं होती। गूगल की Myspace या Xing जैसी साइटों पर जब हम अपने शौक, प्रिय संगीत या जन्मस्थान के बारे में प्रश्नों के उत्तर दे रहे होते हैं, गूगल के कंप्यूटर हमारे बारे में जानने में लगे होते हैं कि हम इंटरनेट की और किन-किन साइटों पर गए, वहाँ हमने क्या खोजा या अपने क्या निशान छोड़े।

इस तरह गूगल चाहे तो हमारी निजी पसंद-नापसंद ही नहीं, हमारे सारे व्यक्तित्व का भी एक पूरा खाका तैयार कर सकता है। यह गूगल की एक सुविचारित युक्ति है कि हमें ललचा-लुभाकर अपनी साइट पर लाया जाए, ताकि हमारे बारे में ऐसी जानकारियाँ जमा की जा सकें, जिनका व्यापारिक लाभ उठाया जा सकता है। उसके लिए हमारे बारे में वे जानकारियाँ सबसे उपयोगी हैं, जिन्हें पाने में दूसरी कंपनियों की भी रुचि हो सकती है।

हम जिन सेवाओं को मुफ्त समझते हैं, गूगल को उन्हीं के बल पर कहीं और से कमाई होती है। अन्य कंपनियाँ हमारे बारे में जानकारियाँ उससे खरीदती हैं या उसे अपने विज्ञापनों के लिए पैसा देती हैं। विज्ञापन पर हर क्लिक के लिए गूगल 80 डॉलर तक वसूल करता है।

अमेरिकी पत्रिका ‘फोर्ब्स’ ने गत मार्च में लिखा कि गूगल के दोनों में से हर सहसंस्थापक के पास 19 अरब डॉलर के बराबर संपत्ति संचित हो गई है,  लेकिन दोनों शान-शौकत से दूर सादी जिंदगी बिताते हैं, जींस और टी-शर्ट पहनते हैं, टोयोटा की छोटी कार प्रीयुस चलाते हैं और केवल 1 डॉलर का प्रतीकात्मक मासिक वेतन लेते हैं। गूगल के दोनों सहसंस्थापक चाहे जितनी सादगी से कॉलेज के नौजवानों जैसा जीवन बिताते हों, एक कंपनी के रूप में गूगल बेहद शक्तिशाली है। गूगल की सफलता इंटरनेट को नए मायने देने का दूसरा नाम है। गूगल न होता तो शायद आज इंटरनेट हमारे सामने वर्तमान स्वरूप में नहीं होता। यह गूगल ही था, जिसने सबसे पहले इसे बहुभाषी बनाया और इस रास्ते में जितनी रुकावटें थीं उन्हें दूर किया। सर्च इंजनों में यूनिकोड का सबसे पहले प्रयोग गूगल ने ही किया, जिसके कारण वह वेब दुनिया की अधिकांश भाषाओं का माध्यम बन गया।

गूगल

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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