कैडबरी – दो कमरों से सौ देशों में पहुँची कैडबरी

कैडबरी

कैडबरी की सफलता वाकई सपनों जैसी लगती है। दो कमरों की एक दुकान से उठकर इसका दुनिया भर में पूरे अदब के साथ फैल जाना एक करिश्मा है। पर, यह सब कैडबरी ब्रदर्स की आगे बढ़ने की जिद के कारण। परिणाम! ऐसी मिठासवाली चॉकलेट बनाई, जिसे खाने के बाद दिल खुश हो गए।

In 1905 William Cadbury commissioned the first proper Cadbury logo. He was in Paris and chose Georges Auriol, who also designed the signs for the Paris Metro, to create the design.  It was a stylized cocoa tree interwoven with the Cadbury name. The Cadbury script logo was based on the signature of William A Cadbury and first appeared on the transport fleet in 1921, than used on sales catalogues and designs. Till 1952 that it was used across major brands.  Another crucial element was the ’Glass and a half’ logo. It was originally used in 1928. First of all it was just on Cadbury Dairy Milk, but now it’s  the face of the company .

बेरोजगार जॉन कैडबरी, ठिकाना 93 बुल स्ट्रीट

कैडबरी की कहानी जानने के लिए हमे लौटना होगा करीब 200 साल पहले के उस दौर में, जब ब्रिटेन दुनिया की एकमात्र महाशक्ति था। कहानी शुरू होती है एक क्वेकर* जॉन कैडबरी नाम के युवा कारोबारी से, जिसका छोटा सा परिवार ब्रिटेन के बर्मिंघम इलाके में रहता था। बेरोजगार जॉन कुछ काम शुरू करना चाहता था। काफी सोच-विचार के बाद उसने चाय, कॉफी और कोको-चॉकलेट ड्रिंक (कोका पेड़ के बीजों से बना एक तरह का ड्रिंक) बेचने के लिए एक छोटी सी दुकान शुरू की। सन् 1824 में बर्मिंघम के 93, बुल स्ट्रीट में शुरू हुई यह दो कमरों की दुकान आज दुनिया की सबसे बड़ी चॉकलेट-कन्फेक्शनरी कंपनी का रूप ले चुकी है। दुकान शुरू करने के साथ जॉन कैडबरी ने पाया कि ग्राहकों की चाय-कॉफी में कम और कोको पेय में ज्यादा रुचि थी। ज्यादा मुनाफा कमाने की दृष्टि से उसने अपना पूरा ध्यान कोको ड्रिंक पर लगाया। वह दुकान के दूसरे कमरे में खुद ही कोका बीज पीसता और पॉउडर के साथ नए प्रयोग कर ग्राहकों को लुभाता। उन दिनों कोका और चॉकलेट ड्रिंक पीना रईसों का शौक माना जाता था। वजह थी कि कोका के बीज सुदूर अमेरिका और अफ्रीकी देशों से मँगाने पड़ते थे, जो काफी खर्चीला सौदा था। बहरहाल, जॉन ने बर्मिंघम के रईसों के स्वाद की नब्ज पकड़ ली थी। जब कुछ पैसा जमा हो गया तो उन्होंने अपने कोका उत्पादों को चॉकलेट के नाम से प्रचारित करना शुरू किया। उन्होंने आक्रामक मार्केटिंग का सहारा लिया, जिससे जल्दी ही उनकी दुकान पूरे इलाके में मशहूर हो गई।

* क्वेकर ः क्रिश्चयन समुदाय की सोसायटी ऑफ फ्रेंड्स के सदस्य, जिन्हें तब विश्वविद्यालयों में प्रवेश नहीं मिलता था। अपनी धार्मिक आस्था के कारण फौज वे जॉइन नहीं करते थे, अतः क्वेकर्स तब अपना व्यवसाय करके जीवन-यापन करते थे।

कैडबरी ब्रदर्स की साझेदारी और सूझ-बूझ

करीब 15 साल बुल्स स्ट्रीट की दुकान चलाने के बाद जॉन कैडबरी ने बड़े सपने देखना शुरू किए, जिसमें खुद की फैक्टरी लगाना सबसे पहला कदम था। चॉकलेट कारोबार को फैलाने के लिए उन्होंने अपने भाई बेंजामिन को साझीदार बनाया। अब वे कैडबरी ब्रदर्स ऑफ बर्मिंघम के नाम से मशहूर हो गए थे। दोनों ने वर्ष 1840 में ब्रिटेन के ब्रिज स्ट्रीट इलाके में फैक्टरी स्थापित की। सन् 1842 में कैडबरी बंधु 11 किस्म के कोको और 16 किस्म के ड्रिंकिंग चॉकलेट बेचने लगे। उनका काम चल निकला और वे सफल उद्यमियों में गिने जाने लगे। 1850 में ब्रिटिश सरकार ने कोका बीजों पर आयात शुल्क घटा दिया, जिससे उनका कारोबार और ज्यादा फलने-फूलने लगा। अपनी खास तरह की चॉकलेट और ड्रिंक्स के कारण वे जल्दी ही वे पूरे ब्रिटेन में मशहूर हो गए। 1854 में उन्हें एक शाही फरमान मिला, जिसमें लिखा गया था कि उनकी चॉकलेट क्वीन विक्टोरिया को भी पसंद है और कैडबरी ब्रदर्स को उनके लिए खास चॉकलेट बनाना है। यह एक बड़ी सफलता थी और ब्रांड को लोकप्रिय बनाने का बेहतरीन मौका भी। जॉन कैडबरी ने इस बात को प्रचारित किया और कैडबरी के नाम से ही फैलाने का निश्चय किया। कैडबरी के कोको एसेंस को कैडबरी बंधुओं ने ‘पूरी तरह शुद्ध इसलिए सर्वश्रेष्ठ’ के नारे के साथ प्रचारित किया। कोको एसेंस ही आज की चॉकलेट का आधार है।

कैडबरी बंधुओं ने मास्टर कन्फेक्शनर फ्रेडरिक किंकेलमेन को उत्पादों की रैसिपी के लिए नियुक्त किया। सन् 1861 में कारोबार को अच्छी तरह स्थापित करने के बाद जॉन कैडबरी ने सेवानिवृत्ति का फैसला किया, क्योंकि उन्होंने अपने दोनों बेटों रिचर्ड और जॉर्ज को अपनी जगह लेने लायक बना दिया था। हालाँकि इसके बाद भी नई पीढ़ी को कारोबार को आगे बढ़ाने में काफी मुश्किलें आईं। उस दौरान फ्रांस और स्विट्जरलैंड चॉकलेट कारोबार में ताकतवर बनकर उभरे थे। फ्रेंच चॉकलेट की क्वालिटी ने उसे बेस्ट इन द वर्ल्ड का दरजा दिला दिया, जो कैडबरी ब्रदर्स के लिए सपना था।

द बेस्ट की जिद, डेयरी मिल्क का जन्म

चॉकलेट उद्योग के लिए चुनौतियाँ नई थीं और कैडबरी की टीम को भी कोई विशेष अनुभव नहीं था। ऐसे में जॉन कैडबरी के पुत्रों ने पिता के पारंपरिक नुस्खे को नई तकनीकों के साथ आजमाया। द बेस्ट की जिद को पूरा करने के लिए कैडबरी ब्रदर्स ने नई तकनीक और नई प्रक्रिया से चॉकलेट बनाने की योजना बनाई। नई और बड़ी फैक्टरी लगाने की योजना ने 1879 में बोर्नविले नामक जगह में आकार पाया। इसके नतीजे भी अच्छे मिले और अब कैडबरी ने बाजार में टिके रहने लायक गुणवत्ता प्राप्त कर ली थी। उन्हें ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों से भी निर्यात के ऑर्डर मिलने लगे। इसी दौरान कैडबरी ने एक ऐसी चॉकलेट बनाई, जिसने कंपनी के साथ चॉकलेट उद्योग का भी कायाकल्प कर दिया। यह चॉकलेट थी डेयरी मिल्क, जो प्रयोग करते-करते अचानक ही बन गई थी। हुआ यूँ कि 1897 में जार्ज कैडबरी कोकोआ की डार्क चॉकलेट के साथ कुछ नया बनाने के लिए प्रयोग कर रहे थे।

उन्होंने उसमें कोको मक्खन, चीनी और मिल्क पॉउडर का पेस्ट मिलाया। मिश्रण को जब चखा गया तो इसमें कमाल का स्वाद था और जब इसे सुखाकर चखा गया तो स्वाद और ज्यादा अच्छा मिला। यह एक नए किस्म की चॉकलेट थी, जिसमें दूध-मक्खन की शक्ति और चीनी का स्वाद था। करीब 4 साल तक चली आर-एंड-डी के बाद परिष्कृत नुस्खा बड़े पैमाने पर अपनाया गया और इसका खूब प्रचार किया गया। इसके लिए तीन नाम सोचे गएङ्तजर्सी, हाईलैंड मिल्क और डेयरी मैड। आगे चलकर डेयरी मैड डेयरी मिल्क में बदल गया। 1905 के दौरान कैडबरीज डेयरी मिल्क अपने खास स्वाद, नरम क्रीम जैसे रूप और चॉकलेटी महक के साथ यूरोप की बाकी मिल्क चॉकलेटों के लिए बड़ी चुनौती बन गई। अब कंपनी ने पूरा ध्यान डेयरी मिल्क पर दिया और आगे के दशकों में यह बेस्ट सेलिंग व ब्रांड लीडर बनकर उभरी तथा इसका वही दबदबा आज 100 साल बाद तक कायम है।

विश्वयुद्ध के दौरान कमाई गुडविल

विश्वयुद्ध के दौरान कैडबरी ने अपने सामाजिक दायित्वों का भी उदारता से निर्वहण करके ‘गुडविल’ कमाई। प्रथम विश्वयुद्ध में कैडबरी के 2,000 पुरुष कर्मचारियों ने फौज जॉइन की। कंपनी ने फौजियों को ऊनी कपड़े, पुस्तकें व चॉकलेट उपहार में भेजे तो उनके आश्रितों की मदद की। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कैडबरी की निर्यात आय बढ़ी और कंपनी ने तस्मानिया में फैक्टरी स्थापित की। इसी दौरान चॉकलेट लीडर कंपनी जे.एस. फ्राय एंड संस को अधिग्रहित किया। दूसरे विश्वयुद्ध के समय कैडबरी ने सरकार को अपनी चॉकलेट फैक्टरी को फौजी उपकरण बनाने के वर्क लम्स के लिए उपयोग करने हेतु सौंप दी। कैडबरी की एंबुलेंस ने हवाई हमले से घायल नागरिकों को भी अस्पताल पहुँचाया। इस सामाजिक सरोकार ने कैडबरी की गुडविल बढ़ाई। सैनिक और नागरिक चॉकलेट को आहार के रूप में सेवन करने लगे।

भारत में चॉकलेट लक्जरी उत्पाद माना जाता था, जिसे मांस-प्रोडक्ट बनाने का श्रेय कैडबरी को है। इसके लिए कैडबरी ने हर आय व आयु वर्ग के लिए कन्फेक्शनरी उत्पाद बनाए और अलग ही अंदाज में प्रमोट किया, जैसेङ्त कैडबरी डेयरी मिल्कङ्तसन् 1905 में लॉञ्च हुई, पर 1998 में भारतीय परिवारों में यह खुशी और मौज-मजे का संदेशवाहक बनकर पहुँचा। चॉकलेट मार्केट में कैडबरी डेयरी मिल्क मार्केट लीडर है। इस हैसियत को बनाए रखने में ‘पप्पू पास हो गया’, ‘कुछ मीठा हो जाए’, ‘क्या स्वाद है जिंदगी में’ जैसे जिंगल्स ने अहम भूमिका निभाई है।

कैडबरी फाइव स्टारङ्तयह चॉकलेट बार क्लासिक गोल्ड रंग से पहचानी जाती है तो इसे प्रमोट करनेवाले जिंगल्स हैंङ्त‘जिंदगी में ना रहे जब, कोई सपना सुहाना’, ‘दिल में जोश भर लो, तुम्हें कुछ है कर दिखाना’, ‘छू लो सितारों को अब दूर नहीं है मंजिल’, ‘जो खाए खो जाए’।

कैडबरी सेलिब्रेशंसङ्तमिठाई व ड्राइ फ्रूट्स के गिफ्ट विकल्प के रूप में कैडबरी सेलिब्रेशंस को लोकप्रिय बनानेवाला जिंगल्स हैङ्त‘रिश्ते पकने दो’।

कैडबरी टेम्पटेशंसङ्तपाँच स्वादों की इस प्रीमियम चॉकलेट्स बार को कैडबरी इंडिया ने ‘टू गुड टू शेयर’ के सूत्र वाक्य के साथ लोकप्रिय बनाया है।

कैडबरी इनक्लेयर्सङ्तकैडबरी इंडिया का यह दूसरा सबसे बड़ा ब्रांड है, जो क्रीम की अंदरूनी परत के कारण पसंद किया जाता है। इसे लोकप्रिय बनानेवाला जिंगल्स हैङ्त‘कर दे दिल पे जादू’।

कैडबरी गेम्सङ्तचमचमाते रंगीन चॉकलेट बटन्स को कैडबरी इंडिया ने ‘फल खाओ मस्ती पाओ’ के नारे के साथ बेचा व लोकप्रिय बनाया है।

कैडबरी बाइट्स स्नेक्सङ्तसन् 2004-05 में कैडबरी बाइट्स को कैडबरी इंडिया ने साल्टी स्नेक्स मार्केट में ‘स्वीट स्नेक्स’ के रूप में इस पंच लाइन के साथ लॉञ्च कियाङ्त‘हर स्नेक नमकीन नहीं होता’।

बोर्नविटा बेवरेजेसङ्तकैडबरी के भारत आगमन (सन् 1948) के साथ कैडबरी बोर्नविटा भारतीय परिवारों में ऐसे माल्ट आधारित फूड के रूप में पहुँचा था, जो पोषण करता है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। इसे प्रमोट करनेवाला जिंगल्स हैङ्त‘तन की शक्ति, मन की शक्तिङ्तबोर्नविटा’।

हॉल्सङ्तकैडबरी के इस उत्पाद की कफ ड्राप्स मार्केट में 50 फीसदी हिस्सेदारी है। हालाँकि यह शुगर कन्फेक्शनरी है, जिसमें मेंथो-लिप्टस फॉर्मूला उपयोग किया है। 24 देशों में 26 फ्लेवर्स के साथ हॉल्स सारी दुनिया में लोकप्रिय है। कहते हैं कि एक साल (सन् 2002) में 1 लाख टन खपत का कीर्तिमान बनाया है कैडबरी हॉल्स ने।

बबलू बबलबेरीङ्तसन् 1984 में लॉञ्च किया गया कैडबरी का यह बबलगम 25 देशों में लोकप्रिय है। इसने भी सबसे ज्यादा बिकनेवाले बबलगम का कीर्तिमान बनाया है।

हर मोरचे पर खरी मिठास

वस्तुतः कैडबरी बंधुओं ने अपना कारोबार विशुद्ध पारिवारिक तरीके से आगे बढ़ाया। वे लोगों के मनमानस से जुड़ते गए। दूसरी पीढ़ी ने जॉर्ज कैडबरी के नेतृत्व में शानदार और वैश्विक सफलता अर्जित की। इसके पीछे जॉर्ज की दूरदृष्टि, लगन और बेहतरीन प्रबंधन क्षमता थी। जब उन्होंने बोर्नविले में नई फैक्टरी लगाई तो अपने 2,500 कर्मचारियों को यह अहसास कराया कि वे भी कैडबरी परिवार का ही हिस्सा हैं। उनके लिए रहने-खाने, चिकित्सा, शिक्षा और प्रशिक्षण की बढि़या सुविधाएँ फैक्टरी की 14 एकड़ जमीन पर ही जुटाई गईं। कर्मचारियों को पेंशन भी दी गईं, जिससे वे पूरी उम्र कंपनी के प्रति वफादार बने रहे। इसके अनुकूल नतीजे निकले और कैडबरी ने अपने उत्पादों में अपेक्षा से ज्यादा गुणवत्ता व स्वाद देने की नई परंपरा कायम की, जो आज तक वैसी ही बनी हुई है। 1920 के दशक में चॉकलेट कारोबार के समानांतर कैडबरी ने कुछ और नए कारोबार शुरू किए। इनमें जे.एस. फ्राय एंड संस का अधिग्रहण प्रमुख था। इससे फ्राय की मशहूर चॉकलेट ब्रांड कैडबरीज के बैनर तले आ गई। इसी दौरान कैडबरीज ने मिल्क ट्रे, कैडबरी फ्लैक जैसे नए ब्रांड लॉञ्च किए, जो काफी सफल रहे। समानांतर कैडबरी डेयरी मिल्क का विकास भी जारी रहा। फलस्वरूप फ्रूट एंड नटवाली डेयरी मिल्क और एक

नई चॉकलेट रोजेस लॉञ्च की गई। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कैडबरीज की चॉकलेट्स का सेवन काफी बढ़ गया। ब्रिटिश सरकार ने भी चॉकलेट को आवश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल कर उसकी उपलब्धता और आपूर्ति पर नियंत्रण का फैसला किया। जापान पर अमेरिका के परमाणु हमले के बाद युद्ध खत्म हो गया और हालात सामान्य होने लगे तो कैडबरीज ने अपने विस्तार की नई रीति-नीति बनाई। इसके लिए नए बाजार तलाशे गए। नई फैक्टरियाँ लगाई गईं। नए उत्पाद और नई तकनीकों के साथ ऐसी प्रचार नीति लागू की गईं, जिससे चॉकलेट की माँग बढ़ सके। 70 फीसदी मार्केट शेयर के साथ कैडबरी आज दुनिया की सबसे बड़ी चॉकलेट (कन्फेक्शनरी) कंपनी है। सारी दुनिया में 70 हजार से ज्यादा लोगों को सीधे रोजगार उपलब्ध करवा रही है तो लाखों लोग इसके उत्पाद बेचकर धनोपार्जन कर रहे हैं।

आजाद भारत में कैडबरी का सफर

यही वह समय था, जब कैडबरीज ने भारतीय उपमहाद्वीप की ओर रुख किया। दिलचस्प बात है कि हमारे यहाँ नई पीढ़ी के लोगों को कैडबरीज अपने ही देश की लगती है। जबकि सच्चाई है कि जितनी पुरानी हमारी आजादी है, कैडबरीज का भारतीय इतिहास भी उतना ही पुराना है। अगस्त 1947 में भारत को गुलामी से मुक्ति मिली और ठीक एक साल बाद कैडबरीज ने भारत में दस्तक दी। शुरू में कंपनी का नाम कैडबरी फ्राय इंडिया लिमिटेड था, जो 1977 में बदलकर कैडबरी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड हो गया। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो खस्ताहाली में फँसे भारत जैसे देश में कैडबरी जैसी कंपनी को अपना भविष्य बनाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं। विविधताओं से भरे हमारे देश में लोगों की मितव्ययिता में से चॉकलेट के लिए पैसे निकालना हँसी-खेल नहीं है। पर, कैडबरी ने यह कर दिखाया। उसने शोध और विकास की वह नीति अपनाईं, जिससे चॉकलेट उन लोगों की भी पसंद बनी, जो बचत करने को कमाई करने के बराबर मानते हैं। भारत में कैडबरी ने कोको रिसर्च सर्विस शुरू की। पुणे के पास इंदूरी फार्म शुरू किया और दुधारू मवेशी पाले, जिससे डेयरी मिल्क को गुणवत्तावाला सस्ता दूध मिल सके। 1967 में कैडबरी ने फाइव स्टार और जेम्स जैसी सस्ती व छोटी चॉकलेट उतारकर बाजार की निचली पायदान तक जाने की कोशिश की। इसके ठीक दो साल बाद कैडबरी की अंतरराष्ट्रीय मूल कंपनी का स्विट्जरलैंड की स्कीवेप्स नामक बड़ी कंपनी के साथ विलय हो गया। नई कंपनी कैडबरी स्कीवेप्स पब्लिक लिमिटेड के रूप में सामने आई। स्कीवेप्स का सॉफ्ट ड्रिंक और जूस का पूरा बाजार नई कंपनी के हिस्से में आ गया और कैडबरी का प्रॉडक्ट-पोर्टफोलिया ऑर्गनिक ग्रोथ के जरिए कई गुना बढ़ गया। भारत में भी कैडबरी ने पैर जमा लिये तो चॉकलेट के साथ-साथ एप्पल जूस और आइसक्रीम के बाजार में भी कदम बढ़ाए। ’90 के दशक में कैडबरी ने भारत में जहां के्रकल, ऑरेंज, स्ट्राबेरी क्रिस्प, मेलो, वाइल्ड लाइफ बार जैसे चॉकलेट लॉञ्च किए तो इनरिच, बोर्नविटा जैसी प्रोटीन ड्रिंक और डोलप आइसक्रीम पेश की। 1988 में मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर में कैडबरी ने एक बड़ी फैक्टरी लगाई, जो बढ़ती माँग की आपूर्ति के लिए सही कदम सिद्ध हुआ।

रीयल टेस्ट से पप्पू तक

संक्षेप में कहें तो यह भारत में वह दौर था जब चॉकलेट का मतलब बच्चों के खाने की चीज या उन्हें बहलाने-फुसलाने का जरिया माना जाता था। कैडबरी ने अपने विज्ञापन कैंपेन से इस धारणा को खत्म किया। ऐसा ही एक जुमला थाङ्त‘रीयल टेस्ट ऑफ लाइफ’, जिसमें क्रिकेट के मैदान पर एक लड़की डांस करते हुए कैडबरी खाती थी। यह विज्ञापन कैंपेन इतना मशहूर हुआ कि इसे एड क्लब, मुंबई ने ‘द कैंपेन ऑफ द सेंचुरी’ का सम्मान दिया। इसके बाद कैडबरी का ‘खानेवालों को खाने का बहाना चाहिए’  कैंपेन भी काफी चला। महानायक अमिताभ बच्चन को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाकर कैडबरी ने ‘कुछ मीठा हो जाए’ और ‘पप्पू पास हो गया’ कैंपेन चलाया, जो काफी पसंद किया गया। मूल रूप से ये कैंपेन कैडबरी डेयरी मिल्क के लिए बने थे, पर इनकी छाया में पर्क, हॉल्स, इक्लेयर्स, सेलिब्रेशन और बाइट्स जैसे ब्रांड भी फले-फूले। 1998 में कैडबरी भारत में अपनी गोल्डन जुबली मनाने के बाद 60 बरस की हो चुकी है। चेयरमैन वायसी पाल व एम.डी. आनंद कृपालु के नेतृत्व में कंपनी में दो हजार कर्मचारियों की समर्पित टीम है, 5 फैक्टरियाँ, 4 सेल्स ब्रांच की पहुँच में है। 14 लाख से ज्यादा ऑउटलेट्स हैं। कंपनी को भारत की बेस्ट मैनेज्ड तथा इंडियाज़ टॉप 25 ग्रेट प्लेस टू वर्क का सम्मान भी मिला है।

वर्ल्ड ऑफ कैडबरी

कैडबरी दुनिया की नंबर 1 कन्फेक्शनरी कंपनी (चॉकलेट-कैंडी बनानेवाली कंपनी), नंबर 2 गम्स कंपनी (चिपचिपी-चबानेवाली कैंडीज़ बनानेवाली कंपनी)और तीसरे नंबर की बेवरेज कंपनी (जूस-सॉफ्ट ड्रिंक बनानेवाली कंपनी) है।

कैडबरी दुनिया की 200 साल पुरानी उन कंपनियों में से है, जिनकी प्रतिष्ठा उसके प्रॉडक्ट्स व ब्रांड्स हैं। आज कैडबरी के पोर्टफोलियो में दो दर्जन से ज्यादा ऐसे प्रॉडक्ट्स हैं जिनकी साख दुनिया भर में है। इनमें कैडबरी चॉकलेट्स, डेयरी मिल्क और इसके वेरिएंट्स, स्कीवेप्स ड्रिंक्स, ट्राइडेंट, डॉ पेपर, बोर्नविटा, हॉल्स, ट्रेबर, बासेट, 7 अप, कनाडा ड्राय, मॉट्स, सेलिब्रेशन, पर्क, पिकनिक जैसे ब्रांड प्रमुख हैं।

कैडबरी का कारोबार दुनिया के 200 से ज्यादा देशों में फैला हुआ है।

कैडबरी ने करीब 55,000 लोगों को प्रत्यक्ष और लाखों लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिया है।

कैडबरी ने बर्मिंघम में अपनी फैक्टरी के करीब एक अनूठा केंद्र बनाया है, जिसे ‘कैडबरी वर्ल्ड’ का नाम दिया गया है। यहाँ पर्यटकों और जिज्ञासुओं को शानदार ढंग से कैडबरी के अब तक के सफर से रूबरू कराया जाता है।

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Prakash Biyani

Author: Prakash Biyani

कॉरपोरेट इतिहासकार प्रकाश बियानी की यह ग्यारहवीं पुस्तक है। श्री बियानी की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में बहुपठित हैं—‘शून्य से शिखर’, ‘जी! वित्तमंत्री जी’, ‘इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल’, ‘इंडियन बिजनेस वुमेन’, ‘25 सुपर ब्रांड्स’ एवं ‘खदान से ख्वाबों तक संगमरमर’। बिजनेस वर्ल्ड पर हिंदी में पहली बार प्रकाशित इन पुस्तकों को प्रबुद्ध पाठकों, विशेषकर बी-स्कूल के छात्रों ने खूब सराहा है। उनकी पुस्तकों के गुजराती, मराठी संस्करण भी लोकप्रिय हुए हैं।

‌किशोर उम्र से लेखन कार्य कर रहे श्री बियानी ने 25 वर्ष (1968-93) भारतीय स्टेट बैंक में महत्वपूर्ण दायित्व सँभालने के बाद दस वर्ष (1994-2003) भास्कर समूह में कॉरपोरेट संपादक का दायित्व सँभाला है। उनके दो हजार से ज्यादा लेख, साक्षात्कार विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। सन् 2003 से फ्रीलांस लेखक के रूप में कार्यरत श्री बियानी विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के निय‌िमत स्तंभ लेखक भी हैं।

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